Album/Category: नात शरीफ़
Shayar: आला हज़रत इमाम अह़मद रज़ा ख़ान
Naatkhwan: उवैस रज़ा क़ादरी
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं
जिस राह चल दिये हैं कूचे बसा दिए हैं।
जब आ गई हैं जोशे रहमत पे उनकी आंखें
जलते बुझा दिये हैं रोते हसा दिए हैं।
एक दिल हमारा क्या है आज़ार उसका कितना
तुम ने तो चलते फिरते मुरदे जिला दिए हैं।
उनके निसार कोई कैसे ही रंज में हो
जब याद आ गए हैं सब गम भुला दिए हैं।
हम से फ़कीर भी अब फेरी को उठते होंगे
अब तो गनी के दर पर बिस्तर जमा दिए हैं।
असरा में गुज़रे जिस दम बेड़े पे क़ुदसियों के
होने लगी सलामी परचम झुका दिए हैं।
आने दो या डुबो दो अब तो तुम्हारी जानिब
कश्ती तुम्ही पे छोड़ी लंगर उठा दिए हैं।
दूल्हा से इतना कह दो प्यारे सवारी रोको
मुश्किल में हैं बराती पुरखार वादिए हैं।
अल्लाह क्या जहन्नम अब भी ना सर्द होगा
रो- रो के मुस्तफा ने दरिया बहा दिए हैं।
मेरे करीम से गर क़तरा किसी ने मांगा
दरिया बहा दिये हैं, दुर-बे बहा दिए हैं।
मुल्के सुख़न की शाही तुम को रज़ा मुसल्लम
जिस समत आ गये हैं सिक्के बिठा दिए हैं।